पश्चिम बंगाल का नाम बदलना एक बार फिर चर्चा में है। BJP के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को कोलकाता में कहा कि राज्य सरकार विधानसभा में ‘पश्चिम बंग’ नाम को लेकर बिल पेश कर सकती है। उन्होंने कहा कि यह बिल इसी विधानसभा सत्र में भी लाया जा सकता है। अगर प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की करीब तीन दशक पुरानी कोशिश एक बार फिर चर्चा में आ जाएगी। समिक भट्टाचार्य के बयान के बाद पश्चिम बंगाल का नाम बदलना राजनीतिक बहस का नया मुद्दा बन गया है। प्रस्तावित नाम ‘पश्चिम बंग’ है, जिसे राज्य के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है।

पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंग’ करने की तैयारी
समिक भट्टाचार्य ने कहा कि राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ रखने का उद्देश्य बंगाल के इतिहास और सांस्कृतिक पहचान को सामने लाना है। उन्होंने यह भी कहा कि नाम बदलने के बाद ‘बांग्ला’ या ‘West Bengal’ जैसे अलग-अलग नामों के इस्तेमाल की जरूरत नहीं होगी। भट्टाचार्य वाराणसी में प्रस्तावित पश्चिम बंग भवन को लेकर आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवालों के जवाब दे रहे थे। इसी दौरान उन्होंने राज्य का नाम बदलने से जुड़ी सरकार की संभावित योजना की जानकारी दी। इसलिए पश्चिम बंगाल का नाम बदलना केवल राज्य विधानसभा के फैसले पर निर्भर नहीं होगा।
वाराणसी में बनेगा पश्चिम बंग भवन

समिक भट्टाचार्य ने वाराणसी में प्रस्तावित पश्चिम बंग भवन को लेकर भी जानकारी दी। उनके मुताबिक, राज्य के संस्कृति और पर्यटन विभाग की ओर से केंद्र सरकार और कूच बिहार के राजपरिवार के वंशजों के साथ मिलकर भवन बनाने की योजना पर काम किया जा रहा है। इस भवन को बंगाल की संस्कृति और परंपरा से जुड़े प्रमुख केंद्र के तौर पर विकसित करने की योजना है। यहां पश्चिम बंगाल से वाराणसी आने वाले पर्यटकों और तीर्थयात्रियों के लिए ठहरने की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा सकती है। उन्होंने कहा कि वाराणसी और बंगाल के बीच लंबे समय से आध्यात्मिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। बंगाली समाज का वाराणसी से पुराना जुड़ाव है। कूच बिहार के राजपरिवार ने 1836 में बनारस कालीबाड़ी की आधारशिला रखी थी। इसके बाद वहां मंदिरों का निर्माण भी कराया गया।
1999 में ज्योति बसु सरकार ने रखा था पहला प्रस्ताव
पश्चिम बंगाल का नाम बदलना कोई नया मुद्दा नहीं है। इसकी पहली बड़ी कोशिश 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के दौरान हुई थी। उस समय राज्य का नाम ‘पश्चिम बंग’ रखने का प्रस्ताव विधानसभा में रखा गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य के नाम को उसकी बंगाली पहचान और इतिहास से जोड़ना बताया गया था। प्रस्ताव को केंद्र सरकार के पास भेजा गया, लेकिन मंजूरी नहीं मिलने के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
2011 और 2016 में भी हुई नाम बदलने की कोशिश
इसके बाद 2016 में एक बार फिर नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। राज्य सरकार ने अलग-अलग भाषाओं के लिए अलग नाम रखने का प्रस्ताव दिया। बाद में विधानसभा ने ‘बांग्ला’ को राज्य का एकमात्र नाम बनाने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया। यह प्रस्ताव भी केंद्र की मंजूरी के बिना लागू नहीं हो सका। अब 2026 में एक बार फिर पश्चिम बंगाल का नाम बदलना चर्चा में है। इस बार प्रस्तावित नाम ‘पश्चिम बंग’ है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार इस प्रस्ताव को विधानसभा में कब पेश करती है और इसे आगे कितना समर्थन मिलता है 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद यह मुद्दा फिर उठा। ममता बनर्जी सरकार ने ‘पश्चिम बंग’ नाम का प्रस्ताव रखा। सरकार का तर्क था कि अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम में West Bengal काफी नीचे आता है और राष्ट्रीय बैठकों में राज्य के प्रतिनिधियों को अपनी बारी के लिए इंतजार करना पड़ता है।