भारत में मानसून की बारिश इस साल सामान्य से 15% कम दर्ज की गई है। पिछले 17 साल में यह सबसे बड़ी कमी है। बिहार में सामान्य से 37% और राजस्थान में 21% कम बारिश हुई। अल नीनो के प्रभाव के बीच मानसून की विदाई शुरू हो चुकी है, जबकि जलाशयों में पानी का स्तर भी पिछले साल के मुकाबले 21% कम है।
भारत में मानसून की बारिश 17 साल में सबसे कम
देश में इस साल मानसून के दौरान बारिश की कमी ने चिंता बढ़ा दी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून से 21 सितंबर तक देश में सामान्य तौर पर 827.2 मिमी बारिश होती है, जबकि इस अवधि में 703.7 मिमी बारिश दर्ज की गई। यानी सामान्य से 123.5 मिमी कम बारिश हुई। इस साल मानसून की बारिश सामान्य से 15% कम रही। इससे पहले 2009 में बारिश में 18.3% की कमी दर्ज की गई थी। बिहार में बारिश सामान्य से 37% और राजस्थान में 21% कम रही, जिससे खेती और जल संसाधनों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
30 सितंबर तक मानसून के पूरे सीजन में सामान्य बारिश का आंकड़ा 868.6 मिमी माना जाता है। सीजन के अंतिम दिनों में उत्तर-पश्चिम भारत से मानसून की तेजी से वापसी हो रही है। ऐसे में बारिश की कमी पूरी होने की संभावना कम है।
राजस्थान से शुरू हुई मानसून की विदाई
देश में मानसून की वापसी 19 सितंबर को पश्चिमी राजस्थान से शुरू हुई थी। इसके बाद पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कुछ अन्य हिस्सों से भी मानसून की विदाई दर्ज की गई। मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, अगले 24 से 48 घंटों में दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के कुछ हिस्सों से भी मानसून की वापसी के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन सकती हैं।
हालांकि, बंगाल की खाड़ी में विकसित हो रहा मौसमी सिस्टम पूर्वी, मध्य और दक्षिण भारत के मौसम को प्रभावित कर सकता है। इसके कारण संबंधित क्षेत्रों में बारिश की संभावना बनी हुई है। सिस्टम की दिशा और तीव्रता के अनुसार बारिश का असर अलग-अलग इलाकों में देखने को मिल सकता है।
क्या है अल नीनो, जिससे मानसून पर पड़ता है असर?
अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य वृद्धि से जुड़ी जलवायु घटना है। इसके दौरान समुद्र और वायुमंडल के बीच होने वाले बदलाव वैश्विक हवाओं, बादलों और वर्षा के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं।
भारत में अल नीनो की स्थिति मानसून को कमजोर करने वाले कारकों में शामिल हो सकती है। हालांकि, देश में बारिश का अंतिम परिणाम केवल अल नीनो पर निर्भर नहीं करता। हिंद महासागर की परिस्थितियां, मानसूनी हवाएं और अन्य मौसमी प्रणालियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
जलाशयों में पिछले साल से 21% कम पानी
कम बारिश का असर केवल मानसून तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव कृषि, पेयजल और बिजली उत्पादन पर भी पड़ सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 प्रमुख जलाशयों में 131.17 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध था, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 21% कम बताया गया। जलाशयों में कम पानी रहने से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम बढ़ सकता है। वहीं, तापमान अधिक रहने पर बिजली की मांग बढ़ने से बिजली व्यवस्था पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
खरीफ की फसलों के बाद रबी की बुवाई पर नजर

कम बारिश, अधिक तापमान और मिट्टी में नमी की कमी खरीफ की फसलों के लिए चुनौती बन सकती है। अगस्त तक खरीफ की बुवाई का रकबा पिछले साल के मुकाबले 1.7% कम बताया गया था। आईसीआरए के आकलन के मुताबिक, कुल रकबे में लगभग 2% की गिरावट की आशंका जताई गई थी। चावल उत्पादन पर भी असर पड़ने का अनुमान सामने आया है। उपलब्ध अनुमान के अनुसार, उत्पादन घटकर 14.4 करोड़ टन रह सकता है। हालांकि, वास्तविक उत्पादन का आकलन फसल की स्थिति और आगे के मौसम के आधार पर होगा।
अक्टूबर से रबी की बुवाई शुरू होने वाली है। गेहूं और चने जैसी फसलों के शुरुआती विकास के लिए पर्याप्त नमी और सिंचाई का पानी महत्वपूर्ण होगा। जलाशयों में कम भंडारण के कारण सिंचाई व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा?
इस साल भारत में मानसून की बारिश में आई कमी ने कृषि, जल प्रबंधन और बिजली उत्पादन से जुड़ी चुनौतियों को बढ़ा दिया है। अब पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में संभावित बारिश के साथ-साथ जलाशयों में उपलब्ध पानी पर नजर रहेगी। रबी की बुवाई के दौरान बारिश की स्थिति, सिंचाई की उपलब्धता और तापमान तय करेंगे कि खरीफ के बाद अगली फसल पर कितना असर पड़ता है। ऐसे में आने वाले सप्ताह किसानों और जल संसाधन प्रबंधन के लिहाज से महत्वपूर्ण रहेंगे।