धौलपुर, 07 फरवरी| पशु विज्ञान केन्द्र, धौलपुर द्वारा राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, जोबनेर, जयपुर के प्रथम स्थापना दिवस के उपलक्ष्य पर “बेक्यार्ड मुर्गी पालन और प्रबंधन विषय पर गाँव-दुवाटी, धौलपुर में एक दिवसीय पशुपालक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया। केन्द्र के प्रभारी अधिकारी डॉ. योगेन्द्र कुमार मीणा ने पशुपालकों को अवगत कराया कि बेक्यार्ड मुर्गी पालन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें घर के आस-पास या पीछे की ओर उपलब्ध रिक्त भूमि में घरेलू श्रम और स्थानीय रूप से प्राप्त चारा एवं जल का उपयोग करके बिना किसी विशेष व्यय के मुर्गियों का पालन किया जाता है।
आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्तियों को आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करने में मुर्गी पालन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मुर्गियाँ प्रायः रसोई अपशिष्ट टूटे हुए अनाज, कीट आदि का भक्षण कर जीवित रहती हैं। उन्हें केवल पृथक रूप से तैयार किया गया कुछ आहार और जल प्रदान करने की आवश्यकता होती है। इन सबके अतिरिक्त मुर्गियों की देखभाल के लिए घरेलू श्रम भी सहजता से उपलब्ध रहता है। यदि आप देसी मुर्गी का पालन करते हैं तो बाजार में देसी मुर्गी के एक दिवसीय चूजों का मूल्य लगभग 30 से 60 रुपए होता है और वर्षभर में एक देसी मुर्गी लगभग 160 से 180 अंडे देती है।
डॉ. मीणा ने मुर्गियों की देशी नस्लों जैसे वनराजा, गिरिराजा, प्रतापधन व कड़कनाथ की विशेषता और महत्व का वर्णन करते हुए मुर्गी फार्म पर ग्रीष्मकालीन शीतकालीन और वर्षा ऋतु में किस प्रकार रखरखाव किया जाए इस विषय पर विस्तार से जानकारी दी। डॉ. मीणा ने यह भी बताया कि देसी अंडा व मांस मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं और एक सफल मुर्गी फार्म पर किस प्रकार जैविक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। अंत में उन्होंने मुर्गियों में होने वाली विभिन्न बीमारिया जैसे मेरेक्स, रानीखेत, गुंबोरो, इनफेक्शियस ब्रोंकाइटिस फाउलपॉक्स तथा उनके टीकाकरण के विषय में विस्तार से बताया साथ ही मुर्गियों में अंतः एवं बाह्य परजीवियों की रोकथाम के विषय में विस्तृत जानकारी प्रदान की। इस प्रशिक्षण शिविर में महिला पशुपालकों सहित 30 पशुपालकों ने भाग लिया।
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