CJI डीवाई Chandrachud का बयान: आलोचना करने वालों ने अयोध्या फैसले को ठीक से नहीं पढ़ा
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डीवाई Chandrachud ने अयोध्या भूमि विवाद फैसले पर खुलकर अपनी बात रखी है। टाइम्स नेटवर्क इंडिया इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में बोलते हुए, उन्होंने कहा कि अयोध्या मामले पर की गई आलोचनाओं के अधिकांश लोग एक हजार से अधिक पन्नों के फैसले का एक भी पन्ना ठीक से नहीं पढ़े हैं। यह बयान उन्होंने जस्टिस रोहिंगटन नरीमन द्वारा अयोध्या फैसले में पंथनिरपेक्षता को “उचित स्थान” नहीं देने के बयान पर प्रतिक्रिया करते हुए दिया।
जस्टिस Chandrachud ने कहा कि फैसले के प्रति आलोचनाओं को सही ढंग से समझने के लिए यह आवश्यक है कि लोग पूरे फैसले को ध्यान से पढ़ें, न कि सिर्फ इसके कुछ हिस्सों को उठाकर उस पर टिप्पणी करें। उनका मानना था कि फैसले की आलोचना करने से पहले यह जरूरी है कि लोग उसका समग्र अध्ययन करें, ताकि वे निष्पक्ष रूप से उसकी वैधता और न्याय को समझ सकें।
अयोध्या फैसले का था बहुमत में समर्थन, फिर भी आलोचनाएँ
अयोध्या भूमि विवाद पर 2019 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिया गया ऐतिहासिक निर्णय भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना गया था। इस फैसले के तहत, विवादित 2.77 एकड़ भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए सौंप दी गई थी और मुस्लिम पक्ष को बाबरी मस्जिद के स्थान पर एक मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन दी गई थी। हालांकि, फैसले को व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ था, लेकिन कुछ वर्गों ने इस निर्णय की आलोचना की थी, खासकर पंथनिरपेक्षता के संदर्भ में।
इस संदर्भ में, जस्टिस रोहिंगटन नरीमन ने कहा था कि अयोध्या भूमि विवाद पर फैसला देते समय पंथनिरपेक्षता को सही स्थान नहीं मिला, और इस मुद्दे को नज़रअंदाज़ किया गया। नरीमन का यह बयान महत्वपूर्ण था क्योंकि वे स्वयं भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश रहे हैं और एक महत्वपूर्ण फैसले में उनकी भूमिका रही है।
जस्टिस Chandrachud का तर्क – फैसले पर बहस सार्वजनिक संपत्ति बन जाती है
जस्टिस डीवाई Chandrachud ने जस्टिस नरीमन के बयान पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “मैं फैसले का एक पक्ष था, तो यह मेरे काम का हिस्सा नहीं है कि फैसले का बचाव करूं या आलोचना करूं। जब कोई जज किसी फैसले में पार्टी होता है, तो वह फैसला सार्वजनिक संपत्ति बन जाता है और उस पर दूसरों को बात करनी होती है।”
उनका यह कथन भारतीय न्यायपालिका की पारदर्शिता और निष्पक्षता को दर्शाता है। जब कोई फैसला अदालत द्वारा दिया जाता है, तो वह केवल न्यायधीशों की नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की संपत्ति बन जाता है। इसका अर्थ है कि इस पर बहस और आलोचना करना किसी भी नागरिक का अधिकार है, बशर्ते वह इसका समग्रता में मूल्यांकन करता हो।
जस्टिस Chandrachud ने यह भी कहा कि यह न्यायधीशों का कर्तव्य है कि वे फैसले पर विचार करें और समाज के सभी पक्षों की राय सुनें, क्योंकि न्यायपालिका की निष्पक्षता और स्वतंत्रता उसी में निहित है। उनका कहना था कि अदालत के फैसले के बाद, उसकी आलोचना या समर्थन समाज का हिस्सा बन जाता है, और इस पर विचार करना आवश्यक है।
पंथनिरपेक्षता और अयोध्या फैसले के आलोचक
जस्टिस नरीमन द्वारा उठाए गए पंथनिरपेक्षता के मुद्दे पर जस्टिस Chandrachud ने कहा कि किसी भी फैसले में पंथनिरपेक्षता को सही तरीके से लागू करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो सकता है, लेकिन उन्हें इस तरह के आलोचनाओं का सही तरीके से जवाब देना चाहिए।
जस्टिस Chandrachud ने यह भी बताया कि न्यायपालिका हमेशा तटस्थ रहती है और समाज के विभिन्न हिस्सों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह आवश्यक नहीं कि हर फैसला पंथनिरपेक्षता के सिद्धांत को उसी तरह से दर्शाता हो, जैसा कुछ लोग उम्मीद करते हैं। न्यायालय का कार्य संविधान और कानून के तहत फैसले करना होता है, जो पूरी तरह से निष्पक्ष और तटस्थ होता है।
अयोध्या विवाद के समय सामाजिक और धार्मिक मुद्दे
अयोध्या विवाद सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से भी अत्यधिक संवेदनशील था। यह मामला एक सदी से अधिक पुराना था और भारत में धार्मिक आस्थाओं के बीच एक गहरे विभाजन को दर्शाता था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को संविधान और कानून के संदर्भ में सुलझाने की पूरी कोशिश की और अंततः विवाद को समाप्त करने में सफलता पाई।
अयोध्या पर फैसला देने के बाद, न्यायपालिका और न्यायधीशों पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी रहा। कुछ वर्गों ने यह आरोप लगाया कि फैसले में पंथनिरपेक्षता का सही सम्मान नहीं किया गया, जबकि कुछ ने इसे न्यायपालिका की निष्पक्षता का उदाहरण माना।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर जोर
जस्टिस Chandrachud ने हमेशा ही भारतीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की अहमियत को बताया है। उनका मानना है कि न्यायपालिका का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य है कानून और संविधान के तहत न्याय प्रदान करना। वह मानते हैं कि न्यायपालिका को समाज के दबाव से मुक्त होकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
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