“कब जागेगा प्रशासन? जैसलमेर में मिट्टी माफिया और गायों की मौत”

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रात के सन्नाटे में जैसलमेर की रेतीली हवाएँ अब शांति नहीं, बल्कि धूल और मशीनों की गड़गड़ाहट लेकर आती हैं ,जहाँ कभी गौरैया चहचहाती थीं, वहाँ आज गहरे गड्ढों में मौत का साया मंडरा रहा है। जैसलमेर शहर से महज 10 किलोमीटर दूर बसा रूपसी गाँव आज अपनी हरियाली, अपनी चारागाह और अपनी गऊ माता को बचाने की आख़िरी लड़ाई लड़ रहा है। यह कहानी उस मिट्टी की है, जो कभी जीवन देती थी और आज उसी मिट्टी के लालच में बेज़ुबान गायों की चीखें दबाई जा रही हैं।

यह कहानी उन मिट्टी माफियाओं की है, जिनकी जेबें भरती जा रही हैं और जिनके सामने प्रशासन ने मानो आँखें मूँद रखी हैं ,रात के अंधेरे में ट्रैक्टरों की कतारें लग जाती हैं ,मिट्टी खोदकर ट्रकों में भरी जाती है—कभी निर्माण के नाम पर, कभी सड़कों के नाम पर, लेकिन हकीकत में सिर्फ लालच के नाम पर ,गाँव के बुज़ुर्ग कहते हैं— “भैया, ये मिट्टी हमारी रीढ़ की हड्डी है। जब तक चारागाह हरी-भरी थी, गायें चैन से चरती थीं, दूध देती थीं। अब ये गड्ढे… मौत के कुएँ बन गए हैं। रात में गाय चरने जाती है, पैर फिसलता है और सुबह सिर्फ लाश मिलती है।” पिछले दो सालों में कई गायें इन गड्ढों में गिरकर अपनी जान गंवा चुकी हैं। एक हृदयविदारक घटना में, एक मादा गाय अपने बछड़े को बचाने के प्रयास में खुद गड्ढे में गिर गई। बछड़ा तो बच गया, लेकिन माँ की आँखें हमेशा के लिए बंद हो गईं।

ग्रामीणों ने कई बार तहसीलदार, एसडीएम, पुलिस और खनन विभाग में शिकायतें दर्ज कराईं ,फोन पर आश्वासन मिले, कागज़ों पर नोटिंग हुई, लेकिन ज़मीन पर हालात जस के तस बने रहे ,क्योंकि माफिया के पास पैसा है, रसूख है और सबसे बड़ी ताक़त—मौन का संरक्षण ,ग्रामीण गुस्से में कहते हैं— “नियम काग़ज़ों में रहते हैं, गड्ढे हक़ीक़त में और गायें तो बेज़ुबान हैं, उनकी चीख कौन सुनेगा?” जैसलमेर में अवैध खनन कोई नई बात नहीं है। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक, बीते वर्षों में जिले में दर्जनों मामले सामने आए, लेकिन कार्रवाई महज़ औपचारिकता बनकर रह गई ,मिट्टी माफिया रात में खुदाई करता है और सुबह तक वही मिट्टी शहर की इमारतों में बदल जाती है ,अब सवाल यह है— कब तक ये गड्ढे बढ़ते रहेंगे? कब तक गऊ माता की बलि चढ़ती रहेगी? कब तक प्रशासन की नींद नहीं खुलेगी? या फिर इंतज़ार उस दिन का है, जब पूरा रूपसी गाँव एक बड़े कब्रिस्तान में बदल जाएगा— जहाँ हरियाली नहीं, सिर्फ मौत की ख़ामोशी बचेगी। अगर आज नहीं चेते, तो कल न हरियाली बचेगी… और न ही कोई गाय

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