महाराष्ट्र में नई सरकार के गठन के बाद Maratha आरक्षण के मुद्दे पर एक बार फिर से गर्मी बढ़ने की संभावना है। Maratha आरक्षण आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता मनोज जरांगे ने राज्य सरकार को एक कड़ा अल्टीमेटम देते हुए कहा है कि यदि सरकार पांच जनवरी तक Maratha समुदाय के ओबीसी श्रेणी में नौकरी कोटे की मांग पूरी नहीं करती है, तो वे नया आंदोलन शुरू करेंगे। इस बयान के साथ ही उन्होंने एक बार फिर अपनी ताकत का अहसास कराते हुए सरकार को चेतावनी दी है कि उनका समुदाय अपनी मांगों से पीछे नहीं हटेगा।
मनोज जरांगे का धमाकेदार एलान
महाराष्ट्र में Maratha आरक्षण आंदोलन को लेकर पिछले कुछ वर्षों से तकरार चल रही है। राज्य में मराठा समुदाय को ओबीसी श्रेणी में आरक्षण का समर्थन मिल रहा है, लेकिन इसके बावजूद कई कानूनी अड़चनों और सरकारी नीतियों के कारण इस मुद्दे का हल नहीं निकल सका है। अब, जैसे ही महाराष्ट्र में नई सरकार ने कार्यभार संभाला है, Maratha आरक्षण के मुद्दे पर एक बार फिर से ताजगी आई है।
मनोज जरांगे ने सरकार के नए नेतृत्व को चेतावनी दी है कि अगर पांच जनवरी तक मराठा समुदाय को ओबीसी श्रेणी में नौकरी कोटे के अधिकार नहीं मिलते, तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। यह बयान उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे और अजित पवार के शपथ ग्रहण के एक दिन बाद दिया, जो इस बात का संकेत है कि सरकार पर दबाव बढ़ाने की रणनीति के तहत जरांगे ने यह कदम उठाया है।
जरांगे का आंदोलन में पिछला अनुभव
मनोज जरांगे, जो Maratha आरक्षण आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक हैं, पहले भी इस मुद्दे को लेकर कई बार भूख हड़ताल कर चुके हैं। पिछली एकनाथ शिंदे सरकार के दौरान भी उन्होंने अपनी मांगों के समर्थन में भूख हड़ताल की थी, और इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार से मराठा समुदाय को ओबीसी श्रेणी में आरक्षण देने की अपील की थी। हालांकि, उस वक्त यह मामला सुप्रीम कोर्ट और राज्य सरकार के बीच कानूनी पेचिदगियों में उलझा हुआ था।
जरांगे ने अपने बयान में साफ किया कि Maratha समुदाय को आरक्षण दिए बिना उनका आंदोलन जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि इस बार अगर सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं करती है, तो वे नया आंदोलन शुरू करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। उनका कहना है, ‘‘हमारी मांगें वही हैं, जो पहले थीं। सरकार ने हमारी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो हम नए सिरे से आंदोलन शुरू करेंगे।’’
सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति
मनोज जरांगे का यह अल्टीमेटम सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति प्रतीत होता है। महाराष्ट्र की राजनीति में जहां शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और भाजपा के बीच आपसी टकराव रहा है, वहीं अब एकनाथ शिंदे की अगुवाई में शिवसेना का भाजपा से गठबंधन हुआ है। इस गठबंधन के बाद, मराठा आरक्षण मुद्दा एक बार फिर से चर्चा में आया है, और इस बार जरांगे जैसे नेता यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि सरकार इस मुद्दे को हल करने के लिए कदम उठाए।
सरकार के नए नेतृत्व में अब तक मराठा आरक्षण के मुद्दे को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है, जिसके चलते जरांगे ने अपनी मांगों के प्रति सरकार की लापरवाही पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि मराठा समुदाय के लोग अब और इंतजार नहीं कर सकते हैं और उनके अधिकारों के लिए वे सड़कों पर उतरने को तैयार हैं।
मराठा समुदाय के लिए ओबीसी श्रेणी में आरक्षण
Maratha आरक्षण आंदोलन की जड़ें महाराष्ट्र में काफी गहरी हैं। मराठा समुदाय राज्य की राजनीति, समाज और आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। लंबे समय से मराठा समुदाय अपनी सामाजिक और आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए आरक्षण की मांग कर रहा है।
राज्य सरकार ने पहले भी मराठा समुदाय के लिए आरक्षण की सिफारिश की थी, लेकिन यह मुद्दा कानूनी अड़चनों में उलझा हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के आरक्षण फैसले को चुनौती दी थी, और यही कारण है कि राज्य सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर किया गया था। मराठा समुदाय के लिए ओबीसी श्रेणी में आरक्षण का मुद्दा इस समय एक संवेदनशील मुद्दा बन चुका है, और राजनीतिक दल इस पर विभिन्न नजरियों से विचार कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम पर दबाव
मनोज जरांगे ने विशेष रूप से मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे और अजित पवार को अपनी चेतावनी दी है। उनका कहना है कि यदि ये नेता मराठा समुदाय की आरक्षण की मांग पर ध्यान नहीं देते हैं, तो अगले एक महीने में आंदोलन और तेज होगा। जरांगे का यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे मुख्यमंत्री और डिप्टी सीएम के शपथ ग्रहण के बाद इसे एक संकेत के रूप में दे रहे हैं कि सरकार अब तक इस मुद्दे पर गंभीर नहीं रही है।
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