पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीया ने ठीक तीन दिन पहले भारतीय जनता पार्टी छोड़ने का ऐलान किया। इसके महज़ 48 घंटे बाद बुधवार को उनके ठिकानों पर एसीबी की छापेमारी हो गई। इस घटनाक्रम ने राजस्थान की राजनीति में हलचल मचा दी और यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या मालवीया पर राजनीतिक दबाव बनाया जा रहा है? इस पूरी कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है आख़िर बीजेपी नहीं चाहती कि महेंद्रजीत सिंह मालवीया कांग्रेस में वापसी करें, क्यों? मालवीया के बीजेपी छोड़ने के ऐलान के बावजूद पार्टी के शीर्ष नेता इसे लगातार नकार रहे हैं।
बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड़ ने मीडिया से कहा “आप ऐसी क्या बातें करते हो, इसमें कोई सच्चाई नहीं है। हमारी आपस में चर्चा हुई है। छोटी-मोटी बातें होती रहती हैं। हमारे यहां कुटुंब प्रबंधन है, हम आपस में समझ लेंगे.. वहीं, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष और बीजेपी नेता अरुण चतुर्वेदी ने कहा— मालवीया आज भी बीजेपी में हैं। कल क्या होगा, इसका जवाब मैं नहीं दे सकता। हमने उनसे बात की है, लेकिन कोई स्पष्ट स्थिति सामने नहीं आई है.. इन बयानों से साफ संकेत मिलता है कि बीजेपी किसी भी सूरत में मालवीया को ‘छूटा हुआ अध्याय’ मानने को तैयार नहीं है।
राजस्थान के आदिवासी अंचल में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है फिसलता आदिवासी वोट बैंक। आंकड़े बताते है कि विधानसभा सीटों पर 2018 में भाजपा का वोट प्रतिशत 36.76 फीसदी था। वहीं 2023 के विधानसभा चुनावों में यह प्रतिशत घटकर करीब 29.6 फीसदी हो गया। इसी बीच एक नई आदिवासी पार्टी ने क्षेत्र में तेज़ी से पकड़ बनाई है, जिसने बीजेपी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं… बीजेपी विकास, हिंदुत्व और वनवासी कल्याण परिषद जैसे संगठनों के ज़रिए आदिवासी समाज में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि आदिवासी राजनीति अक्सर एक चेहरे, एक नेता के इर्द-गिर्द घूमती है।
बीजेपी ने महेंद्रजीत सिंह मालवीया को उसी चेहरे के रूप में देखा है, जो आदिवासी समाज से सीधा संवाद कर सके। कांग्रेस की परंपरागत पकड़ को तोड़ सके और दक्षिणी राजस्थान में बीजेपी को राजनीतिक संजीवनी दे सके… भले ही 2024 के लोकसभा चुनाव में मालवीया बीजेपी को जीत नहीं दिला पाए, लेकिन पार्टी मानती है कि उनका राजनीतिक कद और सामाजिक प्रभाव अभी खत्म नहीं हुआ है।
अगर मालवीया कांग्रेस में लौटते हैं तो बीजेपी की आदिवासी रणनीति को बड़ा झटका लगेगा कांग्रेस को दक्षिणी राजस्थान में फिर से मजबूत आधार मिलेगा। उभरती आदिवासी पार्टियों के साथ कांग्रेस को नैरेटिव बनाने में मदद मिलेगी… यही वजह है कि बीजेपी हर हाल में मालवीया को अपने साथ बनाए रखना चाहती है, चाहे इसके लिए बयानबाज़ी हो या ‘डैमेज कंट्रोल’ महेंद्रजीत सिंह मालवीया सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि आदिवासी अंचल की राजनीति का अहम मोहरा हैं। बीजेपी उन्हें छोड़ना नहीं चाहती, क्योंकि उनका जाना सिर्फ एक इस्तीफा नहीं होगा। बल्कि दक्षिणी राजस्थान में बीजेपी की पूरी राजनीतिक रणनीति पर सवाल खड़े कर देगा।