राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, हर लिंग जांच को साजिश नहीं मान सकते

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राजस्थान हाईकोर्ट ने भ्रूण लिंग जांच के एक मामले में बांसवाड़ा की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अनामिका भारद्वाज को अहम राहत दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल लिंग जांच का आरोप होने से यह स्वतः सिद्ध नहीं होता कि आरोपी ने गर्भपात की साजिश भी रची थी।

क्या है मामला?

यह मामला 17 फरवरी 2017 का है, जब पीसीपीएनडीटी टीम ने एक डिकॉय ऑपरेशन किया था। एक गर्भवती महिला को फर्जी ग्राहक बनाकर डॉक्टर के पास भेजा गया। छापे के दौरान डॉक्टर के पास से 19,000 रुपये और उनकी सहयोगी अनिला से 1,000 रुपये बरामद हुए थे। आरोप था कि एजेंट के जरिए अवैध रूप से गर्भ में शिशु का लिंग बताया जा रहा था। (सह-आरोपी अनिला का निधन हो चुका है, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही समाप्त हो चुकी है।)

निचली अदालत के गंभीर आरोप

बांसवाड़ा की सेशन कोर्ट ने पीसीपीएनडीटी एक्ट के साथ-साथ आईपीसी की धारा 315/511 (जन्म से पहले बच्चे को मारने का प्रयास) और 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत भी आरोप तय कर दिए थे। डॉ. भारद्वाज ने इन धाराओं को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी। इससे पहले भी हाईकोर्ट ने निचली अदालत को पुनर्विचार का निर्देश दिया था, लेकिन 20 जनवरी 2024 को दोबारा वही धाराएं लगाने पर डॉक्टर फिर से हाईकोर्ट पहुंचीं।

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“अदालत पोस्ट ऑफिस नहीं” – हाईकोर्ट

न्यायमूर्ति फरजंद अली की एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि लिंग जांच और गर्भपात दो अलग-अलग चिकित्सकीय प्रक्रियाएं हैं। केवल लिंग जांच की फीस लेने से यह साबित नहीं होता कि गर्भपात की तैयारी भी की गई थी। हाईकोर्ट ने डॉ. आनन्द राय बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश मामले का हवाला देते हुए कहा कि केवल आशंका के आधार पर गंभीर धाराएं नहीं लगाई जा सकतीं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट को अभियोजन पक्ष का ‘माउथपीस’ या ‘पोस्ट ऑफिस’ नहीं बनना चाहिए; आरोप तय करने से पहले उपलब्ध साक्ष्यों का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है।

आगे क्या

हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 315/511 और 120-बी के तहत लगाए गए आरोपों को निरस्त कर दिया है। यानी अब डॉ. अनामिका भारद्वाज पर गर्भपात की साजिश का मुकदमा नहीं चलेगा। हालांकि, पीसीपीएनडीटी एक्ट के तहत अन्य धाराओं में ट्रायल कोर्ट में सुनवाई जारी रहेगी। मामले की अगली कार्यवाही पर अब सबकी नजर रहेगी।

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