बीजेपी की एसीबी रेड अब उसी पर उल्टी पड़ती नजर आ रही है। वागड़ अंचल में मालवीया ने जिस तरह से घेराबंदी की, उसने सियासी समीकरण बदल दिए हैं। रेड के बाद सिर्फ कांग्रेस समर्थक ही नहीं, बल्कि आदिवासी अंचल के आम लोग भी खुलकर मालवीया के समर्थन में सामने आ रहे हैं।
बीते दिनों मालवीया ने वागड़ में बैठक कर न केवल लोगों की सहानुभूति बटोरी, बल्कि साफ संदेश भी दे दिया कि अगर जरूरत पड़ी तो जनता को उनके साथ खड़ा होना होगा यहां तक कि सड़क पर उतरने से भी पीछे नहीं हटना होगा। आदिवासी अंचल में ‘बाप’ के बाद अब मालवीया एक बार फिर बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।
भजनलाल सरकार की नीतियों से नाराज मालवीया ने इशारों-इशारों में बीजेपी के प्रदेश संगठन की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर दिए। उनका कहना कि उन्होंने इस्तीफा ऑनलाइन दे दिया था, इसके बाद पार्टी के भीतर नई बहस को जन्म दे दिया है। प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ का का कहना है कि उनसे रोज बात होती है, लेकिन इस्तीफे पर चर्चा नहीं हुई… इस संगठन और नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी को उजागर करता है। अब मामला सिर्फ मालवीया के जाने या वागड़ में बदलते सियासी समीकरणों तक सीमित नहीं रहा। सवाल बीजेपी संगठन की नीतियों और निर्णय प्रक्रिया पर भी उठने लगे हैं। डबल इंजन सरकार का दम भरने वाली बीजेपी, इस मोर्चे पर भी खुद को कमजोर साबित करती नजर आ रही है। पार्टी के भीतर असहजता साफ महसूस की जा सकती है।
घुटन सिर्फ मालवीया तक सीमित नहीं है। कांग्रेस से बीजेपी में आए कई नेता—राजेंद्र यादव, लालचंद कटारिया समेत अनेक दिग्गज खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। ज्योति मिर्धा को छोड़ दें तो पूर्व कांग्रेसियों की स्थिति पार्टी के भीतर बेहद कमजोर मानी जा रही है। बेचैनी पार्टी के निष्ठावान नेताओं में भी है। जिन्हें इस सरकार में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिली।
सतीश पूनिया को भले ही हरियाणा प्रभारी की जिम्मेदारी मिल गई हो, लेकिन राजेंद्र राठौड़ आज भी बिना पद के ही पार्टी की नीतियों का खुलकर बचाव कर रहे हैं सोशल मीडिया से लेकर जमीन तक विपक्ष के हमलों का आक्रामक जवाब दे रहे हैं। इसके बावजूद भजनलाल सरकार में उन्हें कोई अहम भूमिका नहीं दी गई। वहीं गुर्जर समाज से आने वाले विजय बैंसला जैसे नेता भी समय-समय पर पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोलते रहे हैं। कुल मिलाकर, बीजेपी के भीतर असंतोष की लकीरें अब साफ दिखाई देने लगी हैं और यह संकट सिर्फ एक नेता का नहीं, बल्कि संगठन की दिशा और नेतृत्व की कार्यशैली का बनता जा रहा है।
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