कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश का हमला: डी.वाई. Chandrachud की टिप्पणियों पर विवाद और उपासना स्थल कानून
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने 30 नवंबर 2024 को पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. Chandrachud के उपासना स्थल कानून से जुड़ी टिप्पणियों को लेकर तीखा हमला किया। जयराम रमेश ने कहा कि Chandrachud की टिप्पणियों ने “भानुमति का पिटारा” खोल दिया है, यानी एक ऐसा विवाद जिसने देश में नई राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल मचा दी है। उनके मुताबिक, न्यायमूर्ति Chandrachud की टिप्पणी ने धार्मिक स्थलों के विवादों को एक बार फिर से हवा दी है, जिसे कांग्रेस ने सख्ती से विरोध किया है।
क्या थे न्यायमूर्ति Chandrachud के बयान?
न्यायमूर्ति डी.वाई. Chandrachud की टिप्पणी उस समय सुर्खियों में आई थी जब उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद मामले की सुनवाई के दौरान उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 पर चर्चा की थी। Chandrachud ने यह स्पष्ट किया था कि उपासना स्थल कानून स्वतंत्रता के बाद किसी भी धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र को बदलने से रोकने का दावा नहीं करता है। इसके चलते, उनकी इस टिप्पणी ने विवाद का रूप लिया, खासकर जब यह सवाल उठने लगा कि क्या इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है या नहीं।
कांग्रेस महासचिव ने कहा कि Chandrachud की यह टिप्पणी विवादों को बढ़ावा देने वाली साबित हुई है और इससे न्यायपालिका और राजनीति के बीच की सीमा रेखा और भी धुंधली हो सकती है। उनका आरोप था कि इस तरह की टिप्पणियां केवल धार्मिक विवादों को और भड़काने का काम करती हैं और इससे सामाजिक समरसता को खतरा हो सकता है।
राज्यसभा की 1991 की चर्चा और कानून का इतिहास
जयराम रमेश ने 1991 में उपासना स्थल विधेयक पर हुई राज्यसभा की चर्चा का उल्लेख करते हुए कहा कि इस चर्चा के बाद ही उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम को पारित किया गया था। रमेश ने बताया कि 12 सितंबर 1991 को राज्यसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा हुई थी, और इसके परिणामस्वरूप उपासना स्थल कानून को लागू किया गया। यह कानून विशेष रूप से धार्मिक स्थलों के विवादों को शांत करने के लिए था, जो 15 अगस्त 1947 से पहले किसी धार्मिक समूह से जुड़े थे।
कांग्रेस नेता ने यह भी कहा कि इस चर्चा में उस समय के सांसद और कांग्रेस नेता राजमोहन गांधी का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय था। उन्होंने अपने प्रभावशाली भाषण में यह स्पष्ट किया था कि धार्मिक स्थलों को लेकर विवादों को शांत करने और उनके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने के लिए यह कानून कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रमेश के अनुसार, राजमोहन गांधी का भाषण आज भी प्रासंगिक है और समय की कसौटी पर खरा उतरता है।
उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का उद्देश्य
उपासना स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 भारत में धार्मिक स्थलों के संरक्षण और उनके धार्मिक चरित्र को बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया था। इस कानून का मुख्य उद्देश्य यह था कि 15 अगस्त 1947 के बाद किसी भी धार्मिक स्थल के धार्मिक चरित्र में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता। इसके तहत, जो धार्मिक स्थल स्वतंत्रता से पहले किसी विशेष धार्मिक समुदाय से जुड़े थे, उनके धार्मिक स्वरूप में कोई भी बदलाव न किया जाए।
इस कानून को लाने का मकसद था कि धार्मिक स्थल किसी भी प्रकार के राजनीतिक या सामाजिक विवादों का कारण न बनें और उनका धार्मिक महत्व सुरक्षित रहे। इसका मुख्य उद्देश्य धार्मिक स्थल को लेकर उत्पन्न होने वाले विवादों को शांत करना था ताकि समाज में साम्प्रदायिक सौहार्द्र और शांति बनी रहे।
कांग्रेस का दृष्टिकोण: न्यायपालिका और राजनीति के बीच संतुलन
कांग्रेस पार्टी ने इस विवाद के बीच न्यायमूर्ति Chandrachud के बयान को लेकर अपना विरोध दर्ज कराया है। जयराम रमेश का कहना था कि इस प्रकार के बयान न्यायपालिका और राजनीति के बीच एक महीन रेखा को और धुंधला कर सकते हैं। उनका मानना था कि इस टिप्पणी के माध्यम से न्यायमूर्ति Chandrachud ने संवेदनशील धार्मिक मुद्दे को विवादास्पद बना दिया है, जिससे देश की सामाजिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
कांग्रेस का कहना है कि यह बयान इस समय में साम्प्रदायिक तटस्थता बनाए रखने के लिए आदर्श नहीं है, जब धार्मिक विवादों के कारण पूरे देश में तनाव बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस ने न्यायपालिका से यह अपील की है कि इस प्रकार के बयान देश के सामाजिक समरसता को ध्यान में रखते हुए दिए जाने चाहिए।
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