सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर दाखिल एक नई जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़ ने याचिका के उद्देश्य पर सवाल उठाते हुए कहा कि एक ही मुद्दे पर बार-बार याचिकाएं दायर की जा रही हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग प्रतीत होता है।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नियम बनाए हैं। इस पर सीजेआई ने टिप्पणी की कि ऐसी याचिकाएं कई बार न्यायिक राहत से अधिक मीडिया सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से लाई जाती हैं। उन्होंने पूछा कि इस नई याचिका में ऐसा क्या अलग है, जो पहले से लंबित मामलों में नहीं उठाया गया।
पहले ही लग चुकी है अंतरिम रोक
गौरतलब है कि जनवरी में सुप्रीम कोर्ट इन इक्विटी रेगुलेशंस के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा चुका है। अदालत ने तब कहा था कि नियमों का प्रारूप प्रथम दृष्टया अस्पष्ट है और इसके व्यापक व दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। साथ ही दुरुपयोग की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। इस पर सीजीआई ने तीखी टिप्पणी करते हुए पूछा कि आखिर यह पीआईएल क्यों लाई गई है। उन्होंने कहा, ‘अब यह हद से ज्यादा हो रहा है। यह सब बाहर मीडिया को संबोधित करने के लालच में किया जा रहा है. वरना आप यूट्यूब पर कैसे आएंगे? इस याचिका में ऐसा क्या अलग है जो पहले दाखिल याचिकाओं में नहीं था?’
क्या है विवाद?
इन नियमों को लेकर आलोचकों का तर्क है कि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को सीमित रखा गया है और इसे केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग तक केंद्रित कर दिया गया है। इससे कुछ अन्य वर्ग संस्थागत संरक्षण से बाहर रह सकते हैं। इसी मुद्दे पर देश के कई हिस्सों में छात्र संगठनों और सामाजिक समूहों ने विरोध प्रदर्शन भी किए हैं। ताजा सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियों से संकेत मिला है कि अदालत एक ही विषय पर बार-बार दायर हो रही जनहित याचिकाओं को गंभीरता से देख रही है और PIL के संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंतित है।
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