“One Country, One Election: क्या इससे 10% GDP ग्रोथ संभव?”
“One Country, One Election” की अवधारणा हाल के दिनों में राजनीतिक और आर्थिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है। यह प्रस्ताव भारत सरकार द्वारा पेश किया गया, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित किया जाएगा। इसके पीछे यह तर्क दिया जा रहा है कि इससे न केवल समय की बचत होगी, बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था को भी एक बड़ा बढ़ावा मिलेगा। यह अवधारणा न केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी इसका संभावित प्रभाव बड़ा हो सकता है।
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में आयोग की रिपोर्ट
One Country, One Election: इस मुद्दे को लेकर एक उच्च स्तरीय आयोग का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने की। इस आयोग ने मार्च 2024 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, जिसमें यह अनुशंसा की गई कि लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनावों को एक साथ आयोजित किया जाए। आयोग ने विभिन्न देशों की चुनाव प्रक्रिया का अध्ययन करने के बाद यह निर्णय लिया कि भारत में भी यह मॉडल लागू किया जा सकता है।
अन्य देशों का चुनाव प्रक्रिया का अध्ययन
One Country, One Election: इस आयोग ने दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन और बेल्जियम जैसे देशों की चुनाव प्रक्रिया का अध्ययन किया, जहां एक साथ चुनाव होते हैं। इसके अलावा, जर्मनी, जापान, इंडोनेशिया और फिलिपींस जैसे देशों के अनुभवों को भी ध्यान में रखा गया, जहां यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक लागू की गई है। इन देशों ने एक साथ चुनावों के आयोजन से न केवल चुनावी खर्च को कम किया, बल्कि इसके परिणामस्वरूप उनके आर्थिक विकास में भी वृद्धि देखी गई।
आर्थिक वृद्धि में 1.5% की वृद्धि का अनुमान
One Country, One Election: रामनाथ कोविंद के अनुसार, यदि यह विधेयक लागू हो जाता है, तो इससे भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर में लगभग 1.5 प्रतिशत तक का इजाफा हो सकता है। यह वृद्धि जीडीपी को 7.23 प्रतिशत से बढ़ाकर 10 प्रतिशत तक पहुंचा सकती है। उनका कहना है कि अगर इस वृद्धि को लागू किया जाए, तो भारत जल्द ही दुनिया की शीर्ष तीन-चार आर्थिक महाशक्तियों में शामिल हो सकता है।
इस 1.5 प्रतिशत का आंकड़ा यदि 2023-24 के वित्तीय वर्ष में लागू किया जाए, तो यह 4.5 लाख करोड़ रुपये के बराबर होगा। यह राशि भारत के हेल्थ सेक्टर के कुल सार्वजनिक खर्च का आधा और शिक्षा पर खर्च का एक तिहाई होगी।
निवेश और सार्वजनिक खर्च पर प्रभाव
One Country, One Election: एक राष्ट्र, एक चुनाव का मॉडल भारत के राष्ट्रीय ग्रॉस फिक्स्ड कैपिटल फॉर्मेशन (निवेश) को भी प्रभावित कर सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, इस मॉडल के तहत निवेश का अनुपात करीब 0.5 प्रतिशत बढ़ सकता है, जो एक सकारात्मक आर्थिक संकेत होगा। इसके अलावा, सार्वजनिक खर्च में भी वृद्धि देखी जा सकती है, जो लगभग 17.67 प्रतिशत तक हो सकता है।
मुद्रास्फीति और राजकोषीय घाटे पर प्रभाव
One Country, One Election: आयोग की रिपोर्ट में मुद्रास्फीति पर भी एक साथ चुनावों के प्रभाव का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट में पाया गया कि एक साथ चुनावों और अलग-अलग चुनावों के दौरान महंगाई की दर में अंतर आता है। जहां अलग-अलग चुनावों में महंगाई अधिक होती है, वहीं एक साथ चुनावों से महंगाई में अधिक गिरावट देखी जा सकती है। यह गिरावट लगभग 1.1 प्रतिशत तक हो सकती है, जो देश की आर्थिक स्थिति के लिए एक सकारात्मक संकेत हो सकता है।
इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि चुनाव के दो वर्ष पहले और दो वर्ष बाद राजकोषीय घाटा 1.28 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। हालांकि, यह वृद्धि देश के आर्थिक विकास के लंबी अवधि के दृष्टिकोण से अधिक लाभकारी साबित हो सकती है।
संघीय ढांचे पर विपक्ष का विरोध
One Country, One Election: विपक्षी दलों का यह कहना है कि “एक राष्ट्र, एक चुनाव” का यह प्रस्ताव भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है। उनका तर्क है कि राज्य सरकारों को उनके चुनावों में स्वतंत्रता होनी चाहिए, और केंद्र को राज्य की चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इसके अलावा, विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि इससे राज्यों की स्वायत्तता में कमी आएगी और लोकल मुद्दों पर ध्यान कम होगा।
क्या सच में एक राष्ट्र, एक चुनाव से मिलेगा बूस्टर डोज?
One Country, One Election: यह सवाल अब यह है कि क्या एक राष्ट्र, एक चुनाव वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था को बूस्ट देने में सक्षम होगा? राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस प्रक्रिया से चुनावी खर्च में कमी आ सकती है, जिससे सरकार को अपनी योजनाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा। इसके अलावा, चुनावों के लिए अधिक समय देने से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और निवेश में वृद्धि हो सकती है।
हालांकि, यह भी सत्य है कि इस मॉडल को लागू करने में कुछ चुनौतियाँ आ सकती हैं, जिनमें चुनावी व्यवस्था की पुनर्रचना, राज्यों की स्वायत्तता और राजनीतिक सहमति शामिल हैं। इसके बावजूद, यदि यह मॉडल सफल होता है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा बदलाव ला सकता है।
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