बारामती… वही बारामती, जिसने दशकों से एक नेता को सिर्फ़ विधायक नहीं, बल्कि “अपना आदमी” मानकर अपनाया। आज वही बारामती सुबह बेचैनी और शोक से भर गई। जब अजित पवार चुनावी बैठकों के लिए रवाना हुए थे, तभी लैंडिंग के दौरान उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में कुल 6 लोग सवार थे और सभी का निधन हो गया। डिप्टी CM अजीत पवार भी इस दुनिया में नहीं रहे। लेकिन यह खबर सिर्फ़ एक हादसे की नहीं है। यह है उस नेता की कहानी, जिसने बारामती की पहचान बनकर इतिहास लिखा—अजित पवार।
अजित पवार: बारामती के “अपना दादा”
अजित पवार केवल शरद पवार के राजनीतिक वारिस नहीं थे, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति का सख़्त, निर्णायक और ज़मीनी चेहरा थे। 1991 में पहली बार बारामती से विधायक बनने के बाद, बारामती ने उन्हें कभी नहीं छोड़ा और उन्होंने भी कभी बारामती को नहीं छोड़ा।
सिंचाई मंत्री रहते हुए उन्होंने खेती, पानी और ग्रामीण विकास को अपने एजेंडे में शीर्ष प्राथमिकता दी। उनकी राजनीति में भावनाओं से ज़्यादा फैसलों की धार देखने को मिली। समर्थक उन्हें “अजित दादा” कहते थे।
उपमुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने सत्ता के कई उतार-चढ़ाव देखे—बग़ावत भी, वापसी भी। लेकिन बारामती हमेशा उनके साथ खड़ी रही। आज वही बारामती इंतज़ार कर रही थी कि दादा आएँगे, बात करेंगे, भरोसा देंगे।

राजनीति में पहचान, विरासत से नहीं बल्कि अपने दम पर
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को हुआ। वे राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के संस्थापक शरद पवार के भतीजे थे। 23 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखने के बाद उन्होंने कोऑपरेटिव शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में सदस्य और पुणे सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया।
साल 1995 में बारामती से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने इस सीट को अपना अभेद्य किला बना लिया। बारामती से 7 बार जीतने के बाद उन्होंने राज्य स्तर की राजनीति में मजबूत पहचान बनाई। यही इलाके उनका अंत हुआ, जहां उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ।
उपमुख्यमंत्री और रणनीतिक खिलाड़ी
अजित पवार पहली बार 2010 में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री बने। विभिन्न सरकारों में वित्त, सिंचाई और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग उनके जिम्मे रहे। उन्होंने प्रशासनिक फैसलों में सीधे तौर पर भाग लिया और सिंचाई परियोजनाओं व बजट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
चाचा से सिखी राजनीति, फिर खुद चुनी अलग राह
अजित पवार शरद पवार को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे। उन्होंने चाचा से राजनीति के गुर सीखे, लेकिन वक्त के साथ उनकी सोच अलग हो गई। अजित ने अलग राह चुनकर अपने नेतृत्व और प्रबंधन कौशल को साबित किया।
अचानक मौत, अपूरणीय क्षति
अचानक विमान दुर्घटना में उनके निधन ने सभी पर दुःख की लहर ला दी। महाराष्ट्र और खासकर बारामती को एक ऐसा नेता खोना पड़ा, जिसने राजनीति को निर्णय और कर्म से परिभाषित किया। अजित पवार का नाम हमेशा बारामती और महाराष्ट्र की राजनीति में सम्मान और याद के साथ लिया जाएगा।