अजित पवार के बाद महाराष्ट्र की सियासत, क्या डगमगाएगी फडणवीस की राजनीतिक रणनीति?

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Maharashtra Politics
: महाराष्ट्र की राजनीति में समर्थकों के बीच ‘अजित दादा’ के नाम से पहचाने जाने वाले अजित पवार के निधन से एक ऐसा राजनीतिक शून्य पैदा हो गया है, जिसकी भरपाई निकट भविष्य में संभव नहीं दिखती। सत्ता, संगठन और गठबंधन तीनों स्तरों पर इसका दूरगामी प्रभाव पड़ना तय है।  कभी बारामती और पवार परिवार के इर्द-गिर्द घूमने वाली महाराष्ट्र की राजनीति आज अचानक एक मजबूत धुरी खो चुकी है। अजित पवार का जाना सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि एक पूरे राजनीतिक संतुलन का बिगड़ना है।

सत्ता सुरक्षित, लेकिन संतुलन डगमगाया

संख्याओं के लिहाज से देखें तो महायुति सरकार को तत्काल कोई खतरा नहीं है। विधानसभा में भाजपा के 132, एकनाथ शिंदे गुट के 57 और अजित पवार गुट के 41 विधायक हैं। बहुमत का आंकड़ा 145 है, जो आराम से पार हो रहा है। लेकिन राजनीति सिर्फ संख्या का खेल नहीं होती—वह भरोसे और संतुलन की भी मांग करती है। ‘ट्रिपल इंजन’ सरकार में अजित पवार वह इंजन थे, जो भाजपा और शिंदे गुट के बीच संतुलन बनाए रखते थे। उनके जाने से सरकार का एक महत्वपूर्ण आधार कमजोर पड़ा है। सरकार तो चलेगी, लेकिन पहले जैसी सहजता और स्थिरता के साथ—यह कहना मुश्किल है।

भाजपा का सुरक्षा कवच टूटा

भाजपा के लिए अजित पवार केवल सहयोगी नहीं थे, बल्कि एक रणनीतिक सुरक्षा कवच थे। 2024 के विधानसभा चुनाव में उनके प्रभाव ने देवेंद्र फडणवीस को एकनाथ शिंदे के मुकाबले निर्णायक बढ़त दिलाई थी। अजित पवार का प्रशासनिक अनुभव और मराठा राजनीति पर पकड़ भाजपा के लिए अमूल्य थी।

अब दो उपमुख्यमंत्री पदों में से एक खाली है। अजित गुट इस पद पर दावा करेगा, लेकिन समस्या यह है कि फिलहाल उस गुट में कोई सर्वमान्य उत्तराधिकारी नहीं दिखता। छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेता आगे आ सकते हैं, लेकिन इससे आंतरिक खींचतान बढ़ना तय है। यह खींचतान गुट को तोड़ भी सकती है और महायुति के भविष्य पर सवाल भी खड़े कर सकती है।

एनसीपी और पवार परिवार की नई परीक्षा

अजित पवार के जाने के बाद 85 वर्षीय शरद पवार एक बार फिर महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में लौट आए हैं। हाल ही में एनसीपी के दोनों गुटों के विलय की चर्चाएं तेज थीं। खुद अजित पवार ने स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान पार्टी एकीकरण के संकेत दिए थे। पुणे नगर निगम और जिला परिषद चुनावों में दोनों गुटों का साथ आना इसी संभावना की ओर इशारा करता था।

ajit pawar

अगर यह विलय होता, तो एनसीपी के पास लोकसभा में 8 सांसद और विधानसभा में 51 विधायक होते—जो न केवल राज्य, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी पार्टी को निर्णायक भूमिका में ले आता। अजित पवार के बिना यह प्रक्रिया अब और जटिल हो गई है। ऐसे में शरद पवार का अनुभव और सुप्रिया सुले की राजनीतिक भूमिका निर्णायक हो जाती है।

शिंदे गुट की बढ़ती महत्वाकांक्षा

अजित पवार के न रहने से भाजपा की एकनाथ शिंदे गुट पर पकड़ कमजोर पड़ सकती है। शिंदे गुट के 57 विधायक अब पहले से ज्यादा अहम हो गए हैं। यह स्थिति उन्हें सत्ता में ज्यादा हिस्सेदारी की मांग करने का अवसर देती है। महायुति के भीतर शक्ति संतुलन अब नए सिरे से तय होगा।

नए समीकरणों की शुरुआत

अजित पवार का जाना महाराष्ट्र की राजनीति में सिर्फ एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि एक ऐसे युग का अंत है जिसमें सत्ता प्रबंधन, सामाजिक समीकरण और राजनीतिक व्यावहारिकता साथ-साथ चलते थे। अब महाराष्ट्र की राजनीति एक संक्रमण काल में है—जहां पुराने संतुलन टूट रहे हैं और नए समीकरण अभी आकार ले रहे हैं। आने वाले महीने तय करेंगे कि यह शून्य स्थायी साबित होगा या कोई नई राजनीतिक धुरी इसे भर पाएगी। लेकिन इतना तय है—अजित पवार के बाद महाराष्ट्र की राजनीति पहले जैसी नहीं रहेगी।

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