अरावली पर सियासत: “शर्म करो सरकार” के नारों के बीच गरमाया राजस्थान

By admin
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राजस्थान में अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर सियासत एक बार फिर चरम पर है। सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर 2025 के फैसले के बाद पर्यावरण और राजनीति दोनों मोर्चों पर बहस तेज हो गई है। इस फैसले में अरावली की नई परिभाषा को स्वीकार किया गया है, जिसके तहत केवल 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली भूमि को ही अरावली माना जाएगा।

90% अरावली संरक्षण से बाहर?

पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों का दावा है कि इस नई परिभाषा से अरावली का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकता है। इससे खनन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नए खनन पट्टों पर रोक लगाई है और सस्टेनेबल माइनिंग प्लान तैयार करने के निर्देश भी दिए हैं।

राजेंद्र राठौड़ का कांग्रेस पर हमला

जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए बीजेपी के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला।

उन्होंने कहा कि

  • ‘Save Aravalli’ एक काल्पनिक मुद्दा है, जिसे कांग्रेस ने केवल विरोध के लिए गढ़ा है।
  • फैसले में साफ है कि 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली भूमि ही अरावली मानी जाएगी, इसके बावजूद भ्रम फैलाया जा रहा है।
  • अरावली को सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस शासनकाल में हुआ, जबकि बीजेपी सरकारें इसके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं।

राठौड़ ने तंज कसते हुए कहा कि

“अशोक गहलोत ने भले ही डीपी बदल ली हो, लेकिन राहुल गांधी और गोविंद सिंह डोटासरा जैसे बड़े नेता साथ नहीं आए, इससे साफ है कि कांग्रेस भी गहलोत के साथ नहीं है।”

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि

“2002 में खुद गहलोत सरकार ने 100 मीटर ऊंचाई को लेकर वैधानिक स्वीकृति मांगी थी, जिसके बाद करीब 1008 खनन पट्टे जारी हुए। अब वही लोग अपने कर्म छिपाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं – 900 चूहे खाकर बिल्ली हज को चली। गहलोत और खाचरियावास का पलटवार इन आरोपों का खंडन करते हुए अशोक गहलोत ने वीडियो जारी कर बीजेपी पर गलत आंकड़े पेश करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि “अरावली सिर्फ पहाड़ी नहीं, बल्कि राजस्थान की जीवनरेखा है। केंद्र और राज्य सरकार इसे गंभीरता से लें, इसे प्रतिष्ठा का मुद्दा न बनाएं।”

गहलोत को समर्थन मिला प्रताप सिंह खाचरियावास का, जिन्होंने सड़क पर उतरकर मौन जुलूस निकाला और कहा “अरावली में घुसने नहीं देंगे, चाहे फौज को बुला लेना पड़े।”

बीजेपी नेताओं की तीखी प्रतिक्रिया

खाचरियावास के मौन प्रदर्शन पर पलटवार करते हुए राजेंद्र राठौड़ ने चुटकी ली— “मौन और वो भी प्रताप सिंह खाचरियावास? ये तो हो ही नहीं सकता, उन्हें तो छपास का रोग है।” बीजेपी विधायक महेंद्र पाल ने भी कहावत के जरिए हमला बोला—“माई-माई 5 किलो दी दूंगा, गुप रहना… खाचरियावास कितना भी कर लें, गुप रह ही नहीं सकते। ये मौन जुलूस सिर्फ ढकोसला है।”


राजनीतिक बनाम पर्यावरणीय लड़ाई

बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस को विकास रास नहीं आ रहा, इसलिए वह काल्पनिक मुद्दे खड़े कर रही है। वहीं कांग्रेस इस पूरे मामले को केंद्र सरकार की पर्यावरण के प्रति उदासीनता बता रही है। इस बीच #SaveAravalli सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है, जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं, लेकिन राहुल गांधी या प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का खुला समर्थन अब तक साफ नजर नहीं आया है।


पर्यावरणविदों की चेतावनी

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि नई परिभाषा से

  • अरावली की निरंतरता टूटेगी
  • रेगिस्तान का फैलाव बढ़ेगा
  • भूजल स्तर गिरेगा
  • दिल्ली-NCR की हवा और खराब होगी
  • अरावली का मुद्दा अब केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह राजस्थान की सियासत का बड़ा रणक्षेत्र बन चुका है। बीजेपी इसे कांग्रेस की मुद्दाविहीन राजनीति बता रही है, जबकि कांग्रेस सरकार पर अरावली को नजरअंदाज करने का आरोप लगा रही है। आने वाले दिनों में यह विवाद और तेज होने की संभावना है।
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