उदयपुर : ‘अरावली बचाओ’ मुहिम को मिला वकीलों का समर्थन

By admin
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राजस्थान के उदयपुर से अरावली संरक्षण को लेकर एक बड़ी और अहम खबर सामने आई है। ‘अरावली बचाओ’ अभियान को अब सामाजिक संगठनों के साथ-साथ वकीलों का खुला समर्थन मिल रहा है। मंगलवार को उदयपुर में सैकड़ों वकील सड़कों पर उतरे और कलेक्ट्रेट का घेराव कर सरकार के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया।

यह प्रदर्शन उदयपुर बार एसोसिएशन के बैनर तले किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने हिस्सा लिया। वकीलों ने राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन जिला कलेक्टर को सौंपते हुए मांग की कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर करे।

नई परिभाषा पर क्यों है विरोध?

वकीलों का विरोध केंद्र सरकार की प्रस्तावित नई वैज्ञानिक परिभाषा को लेकर है। इस परिभाषा के अनुसार, 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला माना जाएगा। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इस परिभाषा से अरावली की लगभग 90 प्रतिशत पहाड़ियां कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएंगी।

सीनियर अधिवक्ता राव रतन सिंह ने चेतावनी देते हुए कहा—

“अगर यह परिभाषा लागू हुई तो अरावली क्षेत्र में बड़े पैमाने पर खनन शुरू हो जाएगा। इससे मेवाड़ ही नहीं, आसपास के इलाके भी धीरे-धीरे रेगिस्तान में तब्दील हो सकते हैं। अरावली का लगातार दोहन पहले ही गंभीर चिंता का विषय है।”

पर्यावरण को होगा भारी नुकसान

प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नई परिभाषा लागू होने से:

  • अवैध और वैध खनन गतिविधियां बढ़ेंगी
  • बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य शुरू होंगे
  • जल स्रोत, वन्यजीव और जैव विविधता को नुकसान पहुंचेगा
  • मेवाड़ और आसपास के क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण का खतरा बढ़ेगा

इसी आशंका के चलते वकीलों ने इसे सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि पर्यावरण और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा मुद्दा बताया।

भारी पुलिस बंदोबस्त, फिर भी नहीं रुका विरोध

प्रदर्शन के दौरान किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया। कलेक्ट्रेट के बाहर बैरिकेडिंग भी लगाई गई, लेकिन इसके बावजूद वकीलों का विरोध शांत नहीं हुआ। नारेबाजी के जरिए सरकार से तुरंत फैसला वापस लेने की मांग की गई।

देशभर में फैल रहा ‘अरावली बचाओ’ अभियान

‘अरावली बचाओ’ अभियान अब सिर्फ राजस्थान तक सीमित नहीं रहा। देश के अलग-अलग हिस्सों से पर्यावरणविद्, सामाजिक संगठन और अब वकील भी इस मुहिम से जुड़ते जा रहे हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या सरकार अरावली की नई परिभाषा पर पुनर्विचार करेगी? या फिर देश की सबसे प्राचीन पर्वतमाला को संरक्षण से बाहर होने दिया जाएगा? इस सवाल का जवाब आने वाला वक्त तय करेगा।

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