नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा 23 जनवरी को जारी किए गए ‘उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने’ से जुड़े नए नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने निर्देश दिया है कि अगली सुनवाई तक वर्ष 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। इस मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस ज्योमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि नए नियम स्पष्ट नहीं हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि नियमों की भाषा और अवधारणाएं भ्रम पैदा कर सकती हैं, इसलिए फिलहाल इन्हें लागू करना उचित नहीं होगा।
इन नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं में दावा किया गया था कि UGC के नए प्रावधान मनमाने, भेदभावपूर्ण हैं और संविधान तथा UGC एक्ट, 1956 के प्रावधानों के खिलाफ जाते हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि ये नियम समानता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और कुछ वर्गों को बाहर कर सकते हैं।

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने नियमों में इस्तेमाल किए गए शब्दों पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी व्याख्या से दुरुपयोग की संभावना बनती है। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि समाज में निष्पक्षता और समावेशन को बढ़ावा देना जरूरी है। इसी क्रम में उन्होंने सवाल किया कि जब पहले से ही तीन ‘E’ मौजूद हैं, तो दो ‘C’ जोड़ने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि वे UGC एक्ट की धारा 3(C) को चुनौती दे रहे हैं और इसे असंवैधानिक बताया। उनका कहना था कि यह प्रावधान इस धारणा पर आधारित है कि सामान्य श्रेणी के छात्र भेदभाव करते हैं, जो अनुचित है। इस पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत इस मामले में केवल संबंधित प्रावधानों की कानूनी वैधता और संवैधानिकता की जांच कर रही है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश से नए नियमों के विरोध में याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत मिली है।
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